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Sunday, December 9, 2012

राजनीती में दिलचस्पी नहीं.


अन्याय के खिलाफ एकजुट हो मीडिया

महिला उत्पीडन के मामलो की सुनवाई फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट में हो

भदोही की तरह हर पंचायत हो जागरूक

मैंने अपने बेटी को पिता का नाम दिलाने और सामाजिक सम्मान पाने के लिए संघर्ष की शुरुआत की थी, भदोही आकर मुझे प्यार  सम्मान सब कुछ मिला, हजारो भाई बहन और बुजुर्गो का साथ मिला, कुछ लोग सोच  रहे है की मै राजनीती में आने के लिए सब कर रही हूँ, पर ऐसा नहीं है, मुझे पता है अब राजनीती करना सिर्फ पैसे वालो की बात है, मैं तो दो वक्त की रोटी की भी मोहताज़ हूँ, सम्मान तो मिल गया पर जीवन में बहुत संघर्ष भी करना है, न्यायालय का फैसला कब आये पता नहीं, पर अपना और अपनी बेटी का पेट भरने के लिए मेहनत तो करनी पड़ेगी, मुझे आंचल का भविष्य भी बनाना है,
हस इतना अवश्य है, जिस तरह लोग सच का साथ देकर मुझे मान सम्मान दिलाये, उससे मेरे दिल में हौसला जगा है, जब भी मेरी जैसी किसी भी महिला के साथ अन्याय हुआ और उसे प्रताड़ित किया गया तो उसके हक़ के लिए हमेशा तत्पर रहूंगी, राजनीती से कोई लेना देना नहीं पर सामाजिक कार्यो में भागीदारी निभाने की इच्छा अवश्य है,
लोग कहते है की मीडिया व्यावसायिक हो चुकी है पर ऐसा नहीं है, मीडिया अपने दायित्वों को भालीभाती समझती है, बशर्ते लोग सच के साथ आगे आये, और मीडिया बंधुओ से प्रार्थना करना चाहूंगी की जब भी किसी के साथ अन्याय हो एकजुट होकर साथ दे, क्योंकि आप में ही वह ताकत है जो लोंगो को न्याय दिला सकती है, आप लोग यदि ठान ले तो समाज परिवर्तित हो सकता है, सामाजिक विकृतियों और कुरीतियों के खिलाफ मीडिया को एकजुट होकर लड़ना होगा, उम्मीद है जिस तरह मेरी लड़ाई में मीडिया ने साथ दिया उसी तरह हर पीड़ित महिला या बच्चो तथा अन्याय के खिलाफ खड़ी होगी.
साथ ही सरकार से गुजारिश करती हूँ की मह्लिला उत्पीडन और घरेलू हिंसा जैसे मामलो के लिए फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट बने, जरा सोचिये जिस न्यायालय में तारीखे पर तारीखे पड़ती रहती है, उसका लाभ किसे मिल पाता है, यदि मेरे मामले में ही देर से फैसला आया तो उसका लाभ क्या है, यदि मेरी बेटी अभाव के चलते पढ़ नहीं पाई, फैसला देर से हुआ और मैं आभाव में ही भटकती रही और जिन्दगी के अंतिम पड़ाव पर फैसला आया तो क्या लाभ होगा, ऐसे मामलो की सुनवाई जल्दी होनी चाहिए. ताकि किसी महिला या बच्चे का भविष्य ख़राब न हो. जनप्रतिनिधियों को इस बात पर मंथन करना होगा.
लोग अनैतिक काम इसलिए करते है की उन्हें समाज का दर नहीं रह गया है, यहाँ आकर मैंने बहुत कुछ सीखा है, मेरे जीवन की असली पढाई भदोही में हुयी, पहले लोग समाज से डरते थे, पर अब उन्हें डर नहीं रहा क्योंकि लोग समझते है की पैसे से सब खरीदा जा सकता है, पर भदोही की पंचायतो ने सामाजिक परिवर्तन की जो नई राह खोली है वह एक शुभ शुरुआत है, ऐसे कार्यो को प्रोत्साहन मिलना चाहिए. समाचार पत्रों के माध्यम से पता चला की गाँव में बीवी होने के बाद भी लोग बाहर जाकर शादी करते है, ऐसे लोग दो जिन्दगी बर्बाद करते है, यदि पंचायते इस तरह पूरे देश में जागरूक हुयी तो निश्चय ही परिवर्तन आएगा, लोग यह समझेंगे की कोई महिला सिर्फ खिलौना नहीं होती, वह माँ बहन और बेटी होती होती है.

Wednesday, December 5, 2012

डिंपल यादव जी आपके प्रदेश में नारी का सम्मान है - डिंपल मिश्रा

 जब मैं मुंबई में थी तो सुना करती थी की उत्तरप्रदेश में अपराध का बोलबाला है, भावनाओ की कोई कीमत नहीं है, मैं भदोही आने से डर  रही थी। सोचती थी मैं अपनी बेटी के हक़ के लिए जा रही हूँ, पता नहीं मेरे साथ क्या होगा। पर मन में एक सोच यह भी थी यदि अपने मान सम्मान के लिए और नारी जाती के अधिकारों के लिए हिम्मत जूटा  रही हूँ तो लोगो का साथ अवश्य मिलेगा। मेरे फेसबुक  के साथियों ने मेरा हौसला भी बढाया था, पर सच बात तो यह थी की मन में हिचकिचाहट भी थी। फिर सोचा जब कदम बढ़ा  दिया है तो पीछे क्या हटाना, यदि अपने अधिकारों के लिए लड़ना है तो हिम्मत जुटानी ही पड़ेगी। फेसबुक के साथियों ने हौसला दिया। जब मैंने वाराणसी की धरती पर कदम रखा  तो उत्तरप्रदेश के बारे में मेरी सोच बदलनी  शुरू हो गयी। एक साधारण सी घरेलू महिला जब पहुंची तो उसका भरपूर स्वागत किया गया। मुझे पता था यह सम्मान मेरे लिए नहीं था। बल्कि मेरे मुद्दे के प्रति था। यदि अपने सम्मान की रक्षा में मेरे प्राण भी जाते है तो मुझे परवाह नहीं। भदोही के लोंगो ने मुझे अपनी बेटी और बहन के जैसा सम्मान दिया। 
लोग कहते थे की उत्तरप्रदेश में कोई सुरक्षित नहीं है। पर लोंगो ने सब गलत कहा था। एक अकेली महिला जब अपनी बच्ची को लेकर यहाँ पहुँचने के बाद सुरक्षित है और बिना भय के है तो लोग सुरक्षित क्यों नहीं है। 
मैं आपके भदोही जनपद की  कानून व्यवस्था को भी धन्यवाद देना चाहूंगी। मैंने यहाँ के जिलाधिकारी जी को सिर्फ फेसबूक के जरिये  एक सन्देश भेजा था। पर उन्होंने मेरी बात को गंभीरता से लिया। जब मैं गाँव में पहुंची तो वहा  मेरी सुरक्षा का पूरा इंतजाम था। 
सबसे बड़ी बात तो यह है की भदोही के लोंगो में भारतीय संस्कृति और सम्मान का भाव है। यहाँ के लोग अन्याय के खिलाफ बोलना जानते है। मैं लोंगो के लिए परायी थी किन्तु उनकी  अपनी बन गयी। सच कहू तो मुझे आपके प्रदेश में पहुंचते ही इंसाफ मिल गया। मैं सोचती थी की जब मेरी बेटी बड़ी होगी तो लोग उसे नाजायज़ कहेंगे। पर अब  नहीं क्योंकि गाव के लोंगो ने मुझे बहू माना। पूरे जिले ने मुझे बहू माना। फिर मेरी बेटी नाजायज कैसे। 
शायद भदोही के लोंगो में जिस तरह महिलाओ के लिए सम्मान है और लोग अन्याय के खिलाफ बोलना जानते है यदि इसी तरह देश के सभी लोग हो जाय  तो किसी भी महिला साथ अन्याय नहीं होगा। किसी की भी बहन बेटी इस तरह सडको पर भटकने को मजबूर नहीं होगी।  जिस तरह भदोही की पंचायते अपने अधिकारों के प्रति जागरूक है यदि देश की सभी पंचायते जागरूक हो जाय  तो किसी के साथ अन्याय नहीं होगा। 
डिम्पल जी यह लड़ाई सिर्फ मेरी नहीं बल्कि उन सभी महिलाओ की है जो अन्याय का शिकार हुयी है और न्याय पाने के लिए दर दर भटक रही है।
मैं धन्यवाद भदोही की मीडिया को भी देना चाहूंगी। एक छोटे से शहर में रहकर भी किसी बेसहारा महिला की आवाज़ पूरे देश में पहुचने का माद्दा यहाँ की मीडिया रखती है।
डिंपल जी मैं आप से मिल तो सकती नहीं पर आप अपने पति उत्तर  प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश जी को मेरी तरफ से जरूर धन्यवाद दीजियेगा की उनके प्रदेश में नारी का सम्मान है। यहाँ की पंचायते अभी भी भारतीय संस्कृतियों का सम्मान करती है।
                                                                                        आपकी ----- डिंपल मिश्रा