अन्याय के खिलाफ एकजुट हो मीडिया
महिला उत्पीडन के मामलो की सुनवाई फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट में हो
भदोही की तरह हर पंचायत हो जागरूक
मैंने अपने बेटी को पिता का नाम दिलाने और सामाजिक सम्मान पाने के लिए संघर्ष की शुरुआत की थी, भदोही आकर मुझे प्यार सम्मान सब कुछ मिला, हजारो भाई बहन और बुजुर्गो का साथ मिला, कुछ लोग सोच रहे है की मै राजनीती में आने के लिए सब कर रही हूँ, पर ऐसा नहीं है, मुझे पता है अब राजनीती करना सिर्फ पैसे वालो की बात है, मैं तो दो वक्त की रोटी की भी मोहताज़ हूँ, सम्मान तो मिल गया पर जीवन में बहुत संघर्ष भी करना है, न्यायालय का फैसला कब आये पता नहीं, पर अपना और अपनी बेटी का पेट भरने के लिए मेहनत तो करनी पड़ेगी, मुझे आंचल का भविष्य भी बनाना है,हस इतना अवश्य है, जिस तरह लोग सच का साथ देकर मुझे मान सम्मान दिलाये, उससे मेरे दिल में हौसला जगा है, जब भी मेरी जैसी किसी भी महिला के साथ अन्याय हुआ और उसे प्रताड़ित किया गया तो उसके हक़ के लिए हमेशा तत्पर रहूंगी, राजनीती से कोई लेना देना नहीं पर सामाजिक कार्यो में भागीदारी निभाने की इच्छा अवश्य है,
लोग कहते है की मीडिया व्यावसायिक हो चुकी है पर ऐसा नहीं है, मीडिया अपने दायित्वों को भालीभाती समझती है, बशर्ते लोग सच के साथ आगे आये, और मीडिया बंधुओ से प्रार्थना करना चाहूंगी की जब भी किसी के साथ अन्याय हो एकजुट होकर साथ दे, क्योंकि आप में ही वह ताकत है जो लोंगो को न्याय दिला सकती है, आप लोग यदि ठान ले तो समाज परिवर्तित हो सकता है, सामाजिक विकृतियों और कुरीतियों के खिलाफ मीडिया को एकजुट होकर लड़ना होगा, उम्मीद है जिस तरह मेरी लड़ाई में मीडिया ने साथ दिया उसी तरह हर पीड़ित महिला या बच्चो तथा अन्याय के खिलाफ खड़ी होगी.
साथ ही सरकार से गुजारिश करती हूँ की मह्लिला उत्पीडन और घरेलू हिंसा जैसे मामलो के लिए फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट बने, जरा सोचिये जिस न्यायालय में तारीखे पर तारीखे पड़ती रहती है, उसका लाभ किसे मिल पाता है, यदि मेरे मामले में ही देर से फैसला आया तो उसका लाभ क्या है, यदि मेरी बेटी अभाव के चलते पढ़ नहीं पाई, फैसला देर से हुआ और मैं आभाव में ही भटकती रही और जिन्दगी के अंतिम पड़ाव पर फैसला आया तो क्या लाभ होगा, ऐसे मामलो की सुनवाई जल्दी होनी चाहिए. ताकि किसी महिला या बच्चे का भविष्य ख़राब न हो. जनप्रतिनिधियों को इस बात पर मंथन करना होगा.
लोग अनैतिक काम इसलिए करते है की उन्हें समाज का दर नहीं रह गया है, यहाँ आकर मैंने बहुत कुछ सीखा है, मेरे जीवन की असली पढाई भदोही में हुयी, पहले लोग समाज से डरते थे, पर अब उन्हें डर नहीं रहा क्योंकि लोग समझते है की पैसे से सब खरीदा जा सकता है, पर भदोही की पंचायतो ने सामाजिक परिवर्तन की जो नई राह खोली है वह एक शुभ शुरुआत है, ऐसे कार्यो को प्रोत्साहन मिलना चाहिए. समाचार पत्रों के माध्यम से पता चला की गाँव में बीवी होने के बाद भी लोग बाहर जाकर शादी करते है, ऐसे लोग दो जिन्दगी बर्बाद करते है, यदि पंचायते इस तरह पूरे देश में जागरूक हुयी तो निश्चय ही परिवर्तन आएगा, लोग यह समझेंगे की कोई महिला सिर्फ खिलौना नहीं होती, वह माँ बहन और बेटी होती होती है.
